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संगठन, संघर्ष और सामाजिक न्याय की ज्योति: मजदूरों के प्रथम नेता रावबहादुर नारायण मेघाजी लोखंडे -- डां.प्रा.देवानंद बि.नंदागवळी.

संगठन, संघर्ष और सामाजिक न्याय की ज्योति: मजदूरों के प्रथम नेता रावबहादुर नारायण मेघाजी लोखंडे -- डां.प्रा.देवानंद बि.नंदागवळी.


संकलन/संग्रहक 
हर्षवर्धन देशभ्रतार

9 फरवरी का दिन भारतीय मजदूर आंदोलन के जनक, सत्यशोधक विचारों के निष्ठावान कार्यकर्ता और श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले महान नेता रावबहादुर नारायण मेघाजी लोखंडे की स्मृतियों को विनम्र अभिवादन करने का दिन है। यह दिन केवल स्मरण का नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष करने वाले प्रत्येक कार्यकर्ता को दिशा और प्रेरणा देने वाला दिन है।

ब्रिटिश शासनकाल में मिल मजदूरों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। काम के निश्चित घंटे नहीं थे, साप्ताहिक अवकाश नहीं था, दुर्घटना होने पर उपचार की कोई गारंटी नहीं थी और वेतन की भी निश्चित तिथि नहीं होती थी। मजदूरों का जीवन श्रम, शोषण और असुरक्षा की एक अंतहीन श्रृंखला बन गया था। ऐसे समय में नारायण मेघाजी लोखंडे ने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने मजदूरों को संगठित किया, उन्हें उनके अधिकारों का बोध कराया और संगठित संघर्ष की अपार शक्ति समाज के सामने प्रस्तुत की।

महात्मा ज्योतिराव फुले के समता और सत्यशोधक विचारों से प्रेरित होकर लोखंडे ने मजदूर संगठन खड़ा करने का ऐतिहासिक कार्य किया। “बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन” की स्थापना कर उन्होंने भारत के पहले मजदूर संगठन की नींव रखी और भारतीय मजदूर आंदोलन को एक सशक्त आधार प्रदान किया। मिल मजदूरों के लिए साप्ताहिक अवकाश, दोपहर का विश्राम तथा अधिकारों की जागरूकता के लिए उन्होंने संघर्ष किया, और ‘दीनबंधु’ के माध्यम से शोषितों की आवाज बुलंद की।

15 अक्टूबर 1884 को हजारों मजदूरों के हस्ताक्षर लेकर फैक्टरी कमीशन को एक निवेदन प्रस्तुत किया गया। यह केवल एक आवेदन नहीं था, बल्कि शोषितों के अधिकारों की प्रखर पुकार थी। कई वर्षों के सतत संघर्ष के बाद मिल मालिकों को मजदूरों की मांगें स्वीकार करनी पड़ीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग थी—रविवार का साप्ताहिक अवकाश।

आज हम रविवार को आनंद, विश्राम और परिवार के साथ बिताए जाने वाले दिन के रूप में मनाते हैं; लेकिन इस एक दिन के पीछे एक दृढ़ नेतृत्व का लंबा संघर्ष, हजारों मजदूरों का पसीना और सामाजिक न्याय के लिए प्रज्वलित आंदोलन छिपा हुआ है—इसका स्मरण रखना ही सच्ची कृतज्ञता है। समाज जब इतिहास भूल जाता है तो वर्तमान दिशाहीन हो जाता है, और जब प्रेरणा खो जाती है तो परिवर्तन की शक्ति क्षीण हो जाती है।
            लेखक :- डां.प्रा.देवानंद बि.नंदागवळी 

1895 में हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान किए गए कार्य के लिए उन्हें ‘रावबहादुर’ की उपाधि प्रदान की गई थी। तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने उन्हें “जस्टिस ऑफ पीस” के सम्मान से भी अलंकृत किया। भारत सरकार ने वर्ष 2005 में उनके चित्र सहित एक डाक टिकट जारी कर उनके योगदान का स्मरण किया।

स्वतंत्रता के बाद भारत के महान विधिवेत्ता और भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने श्रम मंत्री के रूप में श्रम कानूनों को सशक्त बनाया और मजदूरों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया। संघर्ष से प्राप्त अधिकार कानून की चौखट में सुरक्षित रहे—यह भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी विशेषता है।

नारायण मेघाजी लोखंडे के कार्य से आज के सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवा पीढ़ी को एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है—यदि समाज बदलना है तो लोगों की पीड़ा को समझना होगा, उन्हें संगठित करना होगा और न्याय के लिए निरंतर संघर्ष करना होगा। रावबहादुर नारायण मेघाजी लोखंडे का इतिहास केवल स्मरण का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी को संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ज्वाला है।

नारायण मेघाजी लोखंडे केवल एक समाज के नेता नहीं थे; वे श्रमजीवी भारत की सशक्त आवाज थे। उन्होंने जो मार्ग दिखाया, वह समता, संगठन और मानवता का मार्ग है। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—अन्याय सहन मत करो, संगठित हो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो।

आज भी देश में असंगठित क्षेत्र के लाखों मजदूर असुरक्षित परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। उनके प्रश्नों के प्रति संवेदनशील होना, उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाना और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाना, उनकी विचारज्योति को आगे ले जाना, शोषित-वंचितों की आवाज को सशक्त करना और सामाजिक न्याय की मशाल जलाए रखना—यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

संघर्ष के बिना अधिकार नहीं मिलते, संगठन के बिना संघर्ष जीता नहीं जाता, और जागरूकता के बिना समाज नहीं बदलता।
भारतीय मजदूर आंदोलन के जनक, सत्यशोधक विचारों के दीपस्तंभ रावबहादुर नारायण मेघाजी लोखंडे को विनम्र अभिवादन।
उनका संघर्ष ही हमारी जागृति का प्रकाश है।

… डॉ.प्रा.देवानंद बि. नंदागवळी

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