बावनथड़ी, चांदपुर और सोंड्या टोला प्रोजेक्ट्स की दुर्दशा!..
शनिवार, 13 जून 2026
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'पानी' के लिए करोड़ों का फंड: पैसा कॉन्ट्रैक्टर्स का,झोली किसानों का खाली..
दिगंबर देशभ्रतार
"साप्ताहिक जनता की आवाज"
भंडारा/तुमसर:- कभी तुमसर और भंडारा जिलों के खेती के विकास की रीढ़ माने जाने वाले सिंचाई प्रोजेक्ट्स आज अपने ही वजूद के लिए जूझ रहे हैं। बावनथड़ी, चांदपुर झील और सोंड्या टोला उपसा सिंचाई योजना की हालत बहुत खराब हो चुकी है, और 35 साल बाद भी यह डरावनी सच्चाई सामने आई है कि किसानों को अपने खेतों की सिंचाई के लिए उतना पानी नहीं मिल पा रहा है, जितना उन्हें मिलना चाहिए।
करीब साढ़े तीन दशक पहले शुरू हुए इन प्रोजेक्ट्स के काम में शुरू से ही नियमों को दरकिनार किया गया। रिहैबिलिटेशन और पानी रोकने जैसे बेसिक काम करने के बजाय, नहर का काम उल्टे क्रम में किया गया। नतीजा यह हुआ कि आज कई डिस्ट्रीब्यूटर्स अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच गई हैं। कई जगहों पर न सिर्फ लाइनिंग नहीं हुई है, बल्कि कुछ नहरों में पेड़ उग आए हैं। विहिरगांव माइनर जैसे इलाकों में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आज तक पानी नहीं पहुंचा है, जबकि बम्हनी और शिवनी इलाके के किसानों का 'टेल' तक पानी पहुंचाने का सपना अभी भी अधूरा है। इन प्रोजेक्ट्स पर मनमाने ढंग से काम करके कॉन्ट्रैक्टर्स ने खूब पैसा कमाया है, लेकिन प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी खराब हो गई है। इनमें से कई कॉन्ट्रैक्टर्स आज पॉलिटिकल स्टेज पर एक्टिव हो गए हैं, प्रोजेक्ट की इस दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है! इतना गुस्से वाला सवाल? जनता पूछ रही है।
तुमसर तालुका में एडमिनिस्ट्रेटिव लापरवाही और प्लानिंग की गलतियों की वजह से खेती को बहुत नुकसान हो रहा है। इन प्रोजेक्ट्स के मुद्दे पर मॉनसून सेशन में चर्चा होनी चाहिए, और किसान टाइम-बाउंड प्रोग्राम और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त एक्शन की मांग कर रहे हैं। अब उम्मीद जताई जा रही है कि सिर्फ वादे काफी नहीं हैं, बल्कि सिंचाई के पानी की समस्या का पक्का हल चाहिए।
AIBP के तहत मिले भारी फंड का असल में कहां खर्च हुआ, इसकी जांच की मांग जोर पकड़ रही है। सिल्टिंग की वजह से पानी जमा करने की कैपेसिटी कम हो गई है। ब्रिटिश ज़माने की डिस्ट्रीब्यूटर खराब हालत में हैं और गोबरवाही इलाके के 12 गांव आज भी पानी से वंचित हैं। सोंड्या टोला पंप और पाइपलाइन में लगातार खराबी आने से इस स्कीम की प्रोडक्टिविटी न के बराबर हो गई है। करोड़ों खर्च करने के बाद भी यह स्कीम सिर्फ़ कागज़ों पर ही ज़िंदा लगती है।
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